5.13.68तद् उन्नसम् पाण्डुर दन्तम् अव्रणम् | शुचि स्मितम् पद्म पलाश लोचनम् | द्रक्ष्ये तद् आर्या वदनम् कदा न्व् अहम् | प्रसन्न तारा अधिप तुल्य दर्शनम्