5.7.6मही तले स्वर्गम् इव प्रकीर्णम् | श्रिया ज्वलन्तम् बहु रत्न कीर्णम् | नाना तरूणाम् कुसुम अवकीर्णम् | गिरेर् इव अग्रम् रजसा अवकीर्णम्