3.51.45
तम् नील जीमूत निकाश कल्पम् सुपाण्डुर उरस्कम् उदार वीर्यम् | ददर्श लंका अधिपतिः पृथिव्याम् जटायुषम् शान्तम् इव अग्नि दावम्