5.59.31
एक वेणी धरा दीना भर्तृ चिन्ता परायणा | अधः शय्या विवर्ण अन्गी पद्मिनी इव हिम आगमे | रावणात् विनिवृत्त अर्था मर्तव्य कृत निश्चया