5.47.20
स बाल भावात् युधि वीर्य दर्पितः | प्रवृद्ध मन्युः क्षतज उपम ईक्षणः | समाससाद अप्रतिमम् रणे कपिम् | गजो महाकूपम् इव आवृतम् तृणैः