5.52.5क्षमस्व रोषम् त्यज राक्षसेन्द्र | प्रसीद मद्वाक्यमिदम् शृणुष्व | वधम् न कुर्वन्ति परावरज्ञा | दूतस्य सन्तो वसुधाधिपेन्द्राः