6.59.38
तस्मिन् प्रवृद्ध उत्तम सानु वृक्षे | शृन्गे विकीर्णे पतिते पृथिव्याम् | महा अहि कल्पम् शरम् अन्तक आभम् | समाददे राक्षस लोक नाथह्