4.33.40
सा पान योगात् च निवृत्त लज्जा दृष्टि प्रसादात् च नरेन्द्र सूनोः | उवाच तारा प्रणय प्रगल्भम् वाक्यम् महार्थम् परिसांत्व रूपम्