4.28.17
क्वचित् प्रकाशम् क्वचिद् अप्रकाशम् नभः प्रकीर्णा अंबु धरम् विभाति | क्वचित् क्वचित् पर्वत संनिरुद्धम् रूपम् यथा शान्त महार्णवस्य