4.28.35मुक्ता समाभम् सलिलम् पतत् वै सुनिर्मलम् पत्र पुटेषु लग्नम् | हृष्टा विवर्ण च्छदना विहंगाः सुरेन्द्र दत्तम् तृषिताः पिबन्ति