6.59.94तम् आह सौमित्रिर् अदीन सत्त्वो | विस्फारयन्तम् धनुर् अप्रमेयम् | अभेहि माम् एव निशा चर इन्द्र | न वानरांस् त्वम् प्रति योद्धुम् अर्हसि