6.59.7अद्य सम्तर्पयिष्यामि पृथिवीम् कपिशोणितैः | स;एवम् उक्त्वा ज्वलन प्रकाशम् | रथम् तुरम्ग उत्तम राजि युक्तम् | प्रकाशमानम् वपुषा ज्वलन्तम् | समारुरोह अमर राज शत्रुह्