6.59.36तम् आपतन्तम् सहसा समीक्ष्य | दीप्त इषु चापम् युधि राक्षस इन्द्रम् | महत् समुत्पाट्य मही धर अग्रम् | दुद्राव रक्षो अधिपतिम् हरि ईशह्