2.106.34तद् अद्भुतम् स्थैर्यम् अवेक्ष्य राघवे | समम् जनो हर्षम् अवाप दुह्खितः | न यात्य् अयोध्याम् इति दुह्खितो अभवत् | स्थिर प्रतिज्नत्वम् अवेक्ष्य हर्षितः