6.59.15
यो असौ रथस्थो मृग राज केतुर् | धून्वन् धनुह् शक्र धनुह् प्रकाशम् | करी इव भात्य् उग्र विवृत्त दम्ष्ट्रह् | स;इन्द्रजिन् नाम वर प्रधानह्