4.30.48सुप्त एक हंसम् कुमुदैः उपेतम् महा ह्रदस्थम् सलिलम् विभाति | घनैः विमुक्तम् निशि पूर्ण चन्द्रम् तारा गण कीर्णम् इव अंतरिक्षम्