5.47.24
तम् आत्त बाण आसनम् आहव उन्मुखम् | खम् आस्तृणन्तम् विविधैः शर उत्तमैः | अवैक्षत अक्षम् बहु मान चक्षुषा | जगाम चिन्ताम् च स मारुत आत्मजः