5.29.8सा वीत शोका व्यपनीत तन्द्री | शान्त ज्वरा हर्ष विबुद्ध सत्त्वा | अशोभत आर्या वदनेन शुक्ले | शीत अन्शुना रात्रिः इव उदितेन