5.47.38निहत्य तम् वज्र सुत उपम प्रभम् | कुमारम् अक्षम् क्षतज उपम ईक्षणम् | तत् एव वीरो अभिजगाम तोरणम् | कृत क्षणः काल इव प्रजा क्षये