6.68.24इति बहु विधम् आकुल अन्तर् आत्मा | कृपणम् अतीव विलप्य कुम्भ कर्णम् | न्यपतद् अथ दश आननो भृश | स्तमनुजम् इन्द्र रिपुम् हतम् विदित्वा