2.21.55
अहम् हि ते लक्ष्मण नित्यमेव | जानामि भक्तिम् च पराक्रमम् च | मम त्वभिप्राय मसन्निरीक्ष्य | मात्रा सहाभ्यर्दसि मा सुदुःखम्