5.47.17स मन्दर अग्रस्थ इव अंशु माली | विवृद्ध कोपो बल वीर्य सम्युतः | कुमारम् अक्षम् सबलम् सवाहनम् | ददाह नेत्र अग्नि मरीचिभिः तदा