6.59.18
यो असौ हयम् कान्चन चित्र भाण्डम् | आरुह्य संध्या अभ्र गिरि प्रकाशम् | प्रासम् समुद्यम्य मरीचि नद्धम् | पिशाच;एष अशनि तुल्य वेगह्