6.70.26
स मुष्टि निष्पिष्ट विकीर्ण मूर्धा | निर्वान्त दन्त अक्षि विलम्बि जिह्वः | देव अन्तको राक्षस राज सूनुर् | गत असुर् उर्व्याम् सहसा पपात