5.7.5
ततो ददर्श उच्च्रित मेघ रूपम् | मनो हरम् कान्चन चारु रूपम् | रक्षो अधिपस्य आत्म बल अनुरूपम् | गृह उत्तमम् हि अप्रतिरूप रूपम्