2.71.46
ताम् शून्य शृन्ग अटक वेश्म रथ्याम् | रजो अरुण द्वार कपाट यन्त्राम् | दृष्ट्वा पुरीम् इन्द्र पुरी प्रकाशाम् | दुह्खेन सम्पूर्णतरः बभूव